मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

स्वातंत्र्यवीर सावरकर हैं 'भारत रत्न'

इतिहास के पृष्ठों पर कुछ ऐसे व्यक्तित्वों की अमर कहानियां दर्ज हैं, जिनका कद किसी पुरस्कार या सम्मान से कहीं अधिक बड़ा होता है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बीते दिन मुंबई में जो बात कही, वह न केवल वीर सावरकर के प्रति श्रद्धा रखनेवाले बंधुओं की भावनाओं का प्रतिबिंब है, बल्कि राष्ट्र के उस उत्तरदायित्व की ओर भी संकेत है जिसे पूरा किया जाना बाकी है। उनका यह कथन कि "वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाएगा," भारत के नायकों के प्रति अपनी कृतज्ञता का स्मरण कराता है। वीर सावरकर का गौरवपूर्ण स्मरण करने में किंचित भी संकोच नहीं होना चाहिए। वीर सावरकर और उनके परिवार ने भारत की स्वतंत्रता और समाज सेवा के लिए जिस प्रकार का बलिदान दिया, उसकी किसी के साथ तुलना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि कुछ कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के दुष्प्रचार के बावजूद राष्ट्रभक्त नागरिकों के हृदय में वीर सावरकर के प्रति अथाह श्रद्धा है। इसलिए देश को बेसब्री से प्रतीक्षा है कि वीर सावरकर को यथाशीघ्र भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। करोड़ों लोगों की इसी आकांक्षा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वर दिया है।

देखें : वीर सावरकर का कितना सम्मान करते थे सरदार भगत सिंह

मुंबई में 'संघ यात्रा के 100 साल' कार्यक्रम में भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वीर सावरकर जैसे राष्ट्रनायक किसी पदक या प्रशस्ति पत्र के मोहताज नहीं हैं। देशवासियों के दिलों में उनका स्थान अमिट है। लेकिन, प्रश्न यह है कि राष्ट्र अपने नायकों के प्रति कृतज्ञता कैसे व्यक्त करता है? भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, और जब यह किसी ऐसे व्यक्ति को मिलता है जिसने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, तो इससे उस पुरस्कार का ही मान बढ़ता है। क्रांतिवीर विनायक दामोदर सावरकर का मूल्यांकन केवल राजनीतिक चश्मे से करना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि एक प्रखर चिंतक, दूरदर्शी लेखक और महान समाज सुधारक भी थे। 1857 के विद्रोह को महज एक 'सिपाही विद्रोह' मानने की औपनिवेशिक मानसिकता को चुनौती देते हुए उसे 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' घोषित करने का बौद्धिक साहस वीर सावरकर ने ही दिखाया था। अंडमान की सेलुलर जेल (काला पानी) की कालकोठरी में दो जन्मों के कारावास की सजा, कोल्हू में बैल की तरह जुतना, और अमानवीय यातनाएं सहने के बाद भी, उनकी राष्ट्रभक्ति की लौ कभी मद्धम नहीं पड़ी। यही कारण है कि युवाओं के हीरो सरदार भगत सिंह वीर सावरकर को पूजनीय मानते थे। वहीं, महात्मा गांधी तो उन्हें भारत माता का सच्चा सपूत कहते थे। गांधीजी तो यहाँ तक मानते थे कि ब्रिटिश सरकार की बुराइयों को स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने उनसे भी पहले पहचान लिया था।

देखें : वीर सावरकर के बारे में क्या लिख रहे थे महात्मा गांधी

स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान छुआछूत के खिलाफ जो सामाजिक क्रांति की और 'पतित पावन मंदिर' की स्थापना की, वह उनके समाज सुधारक रूप का ज्वलंत प्रमाण है। सामाजिक समरसता और अनुसूचित जनजाति के उद्धार में उनका योगदान अप्रतिम है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतंत्रता के बाद के दशकों में वीर सावरकर को लेकर एक नकारात्मक राजनीतिक विमर्श खड़ा किया गया। दया याचिकाओं को लेकर उन पर जो आक्षेप लगाए जाते हैं, वे अक्सर तत्कालीन रणनीतिक और कूटनीतिक परिस्थितियों की अनदेखी करते हैं। 

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उचित ही कहा कि वीर सावरकर को भारत का सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' देने में हो रही देरी का कारण पूछना हर राष्ट्रभक्त का अधिकार है। वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की माँग इतिहास के एक ऐसे अध्याय को सम्मान देने की कोशिश है, जिसे जानबूझकर धुंधला करने के प्रयास हुए। आज जब भारत अपनी स्वाधीनता के अमृत काल में है और औपनिवेशिक प्रतीकों को पीछे छोड़ रहा है, तो यह आवश्यक है कि हम अपने उन नायकों को भी पुनर्स्थापित करें जिन्होंने इस स्वतंत्रता की नींव में अपनी अस्थियां गला दीं। वीर सावरकर को भारत रत्न देना महज एक औपचारिकता नहीं होगी, बल्कि यह उस 'त्याग' का सम्मान होगा, जो घनघोर अंधेरे में भी राष्ट्र के लिए जलता रहा। सही मायनों में, यह पुरस्कार की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला ही कदम सिद्ध होगा। इसमें अधिक विलम्ब नहीं होना चाहिए।

देखें : वीर सावरकर के अपमान पर पत्रिका 'द वीक' को माँगनी पड़ी माफी

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